Sakhi -Class 10-Aalok Bhag 2 ( साखी - कबीरदास -Class 10-seba)

   Sakhi  -Class 10-Aalok Bhag 2 (   साखी -   कबीरदास  -Class 10-seba)     

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साखी 

                                                                                                          

                                                               कबीरदास
                                                             (1398-1518)


हिंदी के जिन भक्त-कवियों की वाणी आज भी प्रासंगिक है, उनमें संत कबीरदास जी अन्यतम हैं। उन्होंने आम जनता के बीच रहकर जनता की सरल-सुबोध भाषा में जनता के लिए उपयोगी काव्य की रचना की। आपकी कविताओं में भक्ति भाव के अलावा व्यावहारिक ज्ञान एवं मानवतावादी दृष्टि का समावेश हुआ है। आपकी
कविताएँ अपने समय में बड़ी लोकप्रिय थीं। इसी लोकप्रियता को लक्षित करके असम-भूमि के श्रीमंत शंकरदेव ने अपने ग्रंथ 'कीर्तन घोषा' में लिखा है कि उरेषा, वाराणसी इत्यादि स्थानों पर साधु संत लोग कबीर विरचित गीत-पद गाते हैं :
 उरेषा वारानसी ठावे ठावे।
कबिर गीत शिष्टसवे गावे।। (कीर्तन घोषा -3/32)

 महात्मा कबीरदास की रचनाएँ अपने समय में भी लोकप्रिय थीं, आज भी वे लोकप्रिय हैं और यह लोकप्रियता आगे भी बनी रहेगी। कविताओं की तरह उनकी जीवन-गाथा भी अत्यंत रोचक है। कहा जाता है कि स्वामी रामानंद के आशीर्वाद के फलस्वरूप सन् 1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से आपका जन्म हुआ
था। लोक-लज्जा के कारण जन्म के तुरंत बाद माँ ने इस दिव्य बच्चे को लहरतारा नामक स्थान के एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से गुजरते हुए नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहे दंपति को वह बालक मिला। खुदा का आशीर्वाद समझकर उन्होंने उस दिव्य बालक को गोद में उठा लिया। उन्होंने बालक का नाम रखा कबीर और उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। 'कबीर' शब्द का अर्थ है-बड़ा, महान, श्रेष्ठ। आगे चलकर कबीरदास जी सचमुच बड़े संत, श्रेष्ठ भक्त और महान कवि बने। सन् 1518 में मगहर स्थान में आपका देहावसान हुआ।


संत कबीरदास जी स्वामी रामानंद के योग्य शिष्य थे। वे इस संसार के रोम-रोम में रमने वाले, प्रत्येक अणु-परमाणु में बसने वाले निर्गुण निराकार 'राम' की आराधना करते थे। उन्होंने पालक पिता-माता नीरू-नीमा की आजीविका को ही अपनाया था। कर्मयोगी कबीरजी जुलाहे का काम करते-करते अपने आराध्य के गीत गाया करते थे। अपने काम-काज के सिलसिले में घूमते-फिरते थे। वे लोगों को तरह-तरह के उपदेश देते थे। परवर्ती समय में शिष्यों ने उनकी अमृतोपम वाणियों को लिखित रूप प्रदान किया। महात्मा कबीरदास की रचनाएँ बीजक नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके तीन भाग है. साखी, सबद और रमैनी।

भाषा पर कबीरदास जी का भरपूर अधिकार था। उनकी काव्य भाषा वस्तुतः तत्कालीन हिंदुस्तानी है, जिसे विद्वानों ने 'सधुक्कड़ी', 'पंचमेल खिचड़ी' आदि कहा है। जनता के कवि कबीरदास ने सरल, सहज बोध गम्य और स्वाभाविक रूप से आये अलंकारों से सजी भाषा का प्रयोग किया है। ज्ञान, भक्ति आत्मा, परमात्मा, माया, प्रेम,
वैराग्य आदि गंभीर विषय उनकी रचनाओं में अत्यंत सुबोध एवं स्पष्ट रूप में व्यक्त हुए है।

साखी शब्द मूल संस्कृत शब्द 'साक्षी' से विकसित है। 'साक्षी' से संबंधित शब्द है 'साक्ष्य', जिसका अर्थ है-प्रत्यक्ष ज्ञान । गुरु सत्य के साक्ष्य प्रमाण के साथ शिष्य को इहलोक और परलोक के तत्वज्ञान की शिक्षा देते हैं। यद्यपि कबीरदास जी विविध शास्त्रों के विधिवत् अध्ययन से दूर थे, परंतु साधु संगति से उन्होंने बहुत कुछ सीखा था। जीवन और जगत की खुली पुस्तक को भी आपने खूब पढ़ा था। उन्होंने अपने ज्ञान और भक्ति के बल पर अपने आराध्य का साक्षात्कार भी कर लिया था। अत: उनके द्वारा विरचित साखियों में हमें विविध विषयों के अनमोल ज्ञान एव अमूल्य संदेश निहित मिलते हैं। आत्मा के रूप में व्यक्ति के भीतर ही परमात्मा की स्थिति, सद्गुरु की महिमा, गुरु-शिष्य का संबंध, कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता, मानसिक शुद्धि की आवश्यकता, जाति के बजाय ज्ञान का महत्व, आत्म-निरीक्षण की जरूरत, गहन साधना एवं कर्म की आवश्यकता, प्रेम-भक्ति की महत्ता और यथासंभव शीघ्र कर्तव्य-पालन की जरूरत-ये दस अनमोल बातें अग्रांकित दस साखियों के जरिए आकर्षक रूप में प्रस्तुत की गई हैं।

 साखी


तेरा साईं तुज्झ में, ज्यों पुहुपन में बास।
कस्तूरी का मिरग ज्यों, फिर-फिर ढूँदै घास ॥ 1 ॥
सत गुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार।
लोचन अनँत उधाड़िया, अनँत दिखावणहार ॥ 2 ॥
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट ॥3॥
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥4॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ॥5॥
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥6॥
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥7॥
जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥8॥
जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।
जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान॥9॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगा, बहुरि करेगो कब ।। 10॥


                       अभ्यासमाला
* बोध एवं विचार
1. सही विकल्प का चयन करो:
(क) महात्मा कबीरदास का जन्म हुआ था।
(अ) सन् 1398 में
(इ) सन् 1370 में
(आ) सन् 1380 में
(ई) सन् 1390 में

उत्तर : (अ) सन् 1398 में .

(ख) संत कबीरदास के गुरु कौन थे?
(अ) गोरखनाथ
(आ) रामानंद
(इ) रामानुजाचार्य
(ई) ज्ञानदेव

उत्तर : (इ) रामानुजाचार्य ৷

(ग) कस्तूरी मृग वन-वन में क्या खोजता फिरता है?
(अ) कोमल घास
(आ) शीतल जल
(ई) निर्मल हवा
(इ) कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ

उत्तर : (इ) कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ ৷

(घ) कबीरदास के अनुसार वह व्यक्ति पंडित है
(अ) जो शास्त्रों का अध्ययन करता है।
(आ) जो बड़े-बड़े ग्रंथ लिखता है।
(इ) जो किताबें खरीदकर पुस्तकालय में रखता है।
(ई) 'जो प्रेम का ढाई आखर' पढ़ता है।

उत्तर : (ई) 'जो प्रेम का ढाई आखर' पढ़ता है।

(ङ) कवि के अनुसार हमें कल का काम कब करना चाहिए?
(आ) कल
(ई) नरसों
(अ) आज
(इ) परसों

उत्तर :  (अ) आज ৷ 

2. एक शब्द में उत्तर दो:
(क) श्रीमंत शंकरदेव ने अपने किस ग्रंथ में कबीरदास जी का उल्लेख किया है?

उत्तर : कीर्तन  घोषा।

(ख) महात्मा कबीरदास का देहावसान कब हुआ था?

उत्तर : 1518 में। 

(ग) कवि के अनुसार प्रेमविहीन शरीर कैसा होता है?

उत्तर : लोहार की खाल की तरह। 

(घ) कबीरदास जी ने गुरु को क्या कहा है?

उत्तर : कुम्हार। 

(ङ) महात्मा कबीरदास की रचनाएँ किस नाम से प्रसिद्ध हुईं ?

उत्तर : वीजक। 

3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
(क) कबीरदास के पालक पिता-माता कौन थे ?

उत्तर : कबीरदास के पालक पिता-माता नीरु और नीम थे।

(ख) 'कबीर' शब्द का अर्थ क्या है?

उत्तर : 'कबीर' शब्द का अर्थ बड़ा, महान, श्रेष्ठ  ।

(ग) 'साखी' शब्द किस संस्कृत शब्द से विकसित है?

उत्तर : ‘साखी' शब्द संस्कृत साक्षी' शब्द से विकशित है।

(घ) साधु की कौन-सी बात नहीं पूछी जानी चाहिए?

उत्तर : साधु को जाति के बारे में नही पूछी जानी चाहिए।

(ङ) डूबने से डरने वाला व्यक्ति कहाँ बैठा रहता है?

उत्तर : डुबने से डरनेवाले व्यक्ति किनारे बैठा रहता है।

4. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):
(क) कबीरदास जी की कविताओं की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।

उत्तर : कबीर दास की कविताएँ अपने समय में बड़ी लोकप्रिय थी। आज भी वे लोक प्रिय है और यह लोक प्रियता आगे भी बनी रहेगी। इसी लोकप्रियता की लक्षित करके असम-भूमि के श्रीमंत शंकरदेव ने अपने ग्रंथ 'कीर्तन घोषा' में कबीर की कविता की लोकप्रियता के बारेमें भी लिखा था।

(ख) कबीरदास जी के आराध्य कैसे थे?

उत्तर : कबीर दास जी के आराध्य इस संसार के रोम-रोम में रोमनेवाले, प्रत्येक अणु-परमाणु में बसनेवाले निर्गुण निराकार 'राम' थे।

(ग) कबीरदास जी की काव्य भाषा किन गुणों से युक्त है?

उत्तर : कबीरदास जी की काव्य भाषा तत्कालीन हिन्दुस्थानी है, जिसे विद्वानों  ने साधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी आदि कहा है। यह सरल, सहज बोध गण्य और स्वाभविक रुप से आये अलंकारो से सजी है।

(घ) 'तेरा साईं तुझ में, ज्यों पुहुपन में बास' का आशय क्या है?

उत्तर : तेरा साई तुझ में, ज्यौं पुहुपन में बास का आशय यह है कि जिस तरह फूल में ही सुगंध निहीत है, उसी प्रकार तुम्हारेहृदय में ही भगवान विद्यमान है।

(ड.) 'सत गुरु' की महिमा के बारे में कवि ने क्या कहा है?

उत्तर : कवि के अनुसार सतगुरु की महिमा अनंत है। वे अनंत उपकार करते हैं।

(च) 'अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट' का तात्पर्य बताओ।

उत्तर : 'अंतर हाथ सहारदे, बाहर बाहै चोट' का तात्पर्य यह है कि गुरु अपने शिष्यों के अंतर मन को ज्ञान सहानुभूति से भरा देते हैं और दोषों को दूर करने के लिए कभी बाहर (शरीर में) चोट करते हैं।

5. संक्षेप में उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में):
(क) बुराई खोजने के संदर्भ में कवि ने क्या कहा है?

उत्तर : बुराई खोजने के संदर्भ में कुबीरदास ने कहा है कि दूसरों की बुराइयां दिने से पहले अपने अंदर रहनेवाली बुराइयों को खोजना चाहिए, तब हमें पिने अंदर अनेक बुराइयां मिलेंगी।

(ख) कबीर दास जी ने किसलिए मन का मनका फेरने का उपदेश दिया है?

उत्तर : कबीर दास जी ने इसलिए मन का मनका फेरने का उपदेश दिया है कि कर का मनका फेरना केवल दिखवाना मात्र है। भगवान का नाम अपने के लिए कोई मनका फेरने का आवश्यक नही हैं, केवल चाहिए मन का मनको । कच्चे हृदय वाले लोग केवल दिखवाने के लिए ही मनका फेरता है।

(ग) गुरु शिष्य को किस प्रकार गढ़ते हैं?

उत्तर : गुरु और शिष्य का संमंध कुम्हार और कुंभ जैसा होता है। जिस तर कुम्हार कुंभ को बनाते समय उसकी त्रुटिया ठीक करने के लिए बार बार चो करता है, वैसे गुरु भी अपने शिष्योो के अंतर मन को ज्ञान सहानुभूति से भर देते हैं और शिष्यों के दोषों (त्रुटियाँ) को दूर करने के लिए कभी वाहर (शरी में) चोट कर शिष्य को गढ़ते हैं।

(घ) कोरे पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर कबीरदास जी ने किस प्रकार प्रकाश डाला है?

उत्तर :  कोर पुस्तकीय ज्ञान की निरर्थकता पर प्रकाश डालते हुए कबीरदास ने कहा है कि -- पुस्तक पढ़ते पढ़ते संसार के सभी लोग मर गये हैं, फिर भी कोई पंडित (विद्यान) नहीं बन सका। क्योंकि ज्ञान के साथ प्रेम होना जरुरी है। जिनके हृदय में प्रेम का संचार नहीं हैं, उनके पुस्तकीय ज्ञान भी असार है। अर्थात जिन व्यक्ति के हृदय में प्रेम का भाव विराजमान है, वह व्यक्ति ही रहडित बन सकता है।


6.सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) संत कबीरदास की जीवन-गाथा पर प्रकाश डालो।

उत्तर : महात्मा कबीरदास की रचनाएँ अपने समय में भी लोकप्रिय थीं, आज भी वे लोकप्रिय हैं और यह लोकप्रियता आगे भी बनी रहेगी। कविताओं की तरह उनकी जीवन-गाथा भी अत्यंत रोचक है।
था। लोक-लज्जा के कारण जन्म के तुरंत बाद माँ ने इस दिव्य बच्चे को लहरतारा नामक स्थान के एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से गुजरते हुए नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहे दंपति को वह बालक मिला। खुदा का आशीर्वाद समझकर उन्होंने उस दिव्य बालक को गोद में उठा लिया। उन्होंने बालक का नाम रखा कबीर और उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। 'कबीर' शब्द का अर्थ है-बड़ा, महान, श्रेष्ठ। आगे चलकर कबीरदास जी सचमुच बड़े संत, श्रेष्ठ भक्त और महान कवि बने। संत कबीरदास जी स्वामी रामानंद के योग्य शिष्य थे। वे इस संसार के रोम-रोम में रमने वाले, प्रत्येक अणु-परमाणु में बसने वाले निर्गुण निराकार 'राम' की आराधना करते थे। उन्होंने पालक पिता-माता नीरू-नीमा की आजीविका को ही अपनाया था। कर्मयोगी कबीरजी जुलाहे का काम करते-करते अपने आराध्य के गीत गाया करते थे। अपने काम-काज के सिलसिले में घूमते-फिरते थे। वे लोगों को तरह-तरह के उपदेश देते थे। परवर्ती समय में शिष्यों ने उनकी अमृतोपम वाणियों को लिखित रूप प्रदान किया। महात्मा कबीरदास की रचनाएँ बीजक नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके तीन भाग है. साखी, सबद और रमैनी।


(ख) भक्त कवि कबीरदास जी का साहित्यिक परिचय दो।

उत्तर : हिंदी के जिन भक्त-कवियों की वाणी आज भी प्रासंगिक है, उनमें संत कबीरदास जी अन्यतम हैं। उन्होंने आम जनता के बीच रहकर जनता की सरल-सुबोध भाषा में जनता के लिए उपयोगी काव्य की रचना की। आपकी कविताओं में भक्ति भाव के अलावा व्यावहारिक ज्ञान एवं मानवतावादी दृष्टि का समावेश हुआ है। आपकी कविताएँ अपने समय में बड़ी लोकप्रिय थीं। इसी लोकप्रियता को लक्षित करके असम-भूमि के श्रीमंत शंकरदेव ने अपने ग्रंथ 'कीर्तन घोषा' में लिखा है कि उरेषा, वाराणसी इत्यादि स्थानों पर साधु संत लोग कबीर विरचित गीत-पद गाते हैं :
 उरेषा वारानसी ठावे ठावे।
कबिर गीत शिष्टसवे गावे।। (कीर्तन घोषा -3/32)

 महात्मा कबीरदास की रचनाएँ अपने समय में भी लोकप्रिय थीं, आज भी वे लोकप्रिय हैं और यह लोकप्रियता आगे भी बनी रहेगी। कविताओं की तरह उनकी जीवन-गाथा भी अत्यंत रोचक है।  लोक-लज्जा के कारण जन्म के तुरंत बाद माँ ने इस दिव्य बच्चे को लहरतारा नामक स्थान के एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था। वहाँ से गुजरते हुए नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहे दंपति को वह बालक मिला। खुदा का आशीर्वाद समझकर उन्होंने उस दिव्य बालक को गोद में उठा लिया। उन्होंने बालक का नाम रखा कबीर और उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। 'कबीर' शब्द का अर्थ है-बड़ा, महान, श्रेष्ठ। आगे चलकर कबीरदास जी सचमुच बड़े संत, श्रेष्ठ भक्त और महान कवि बने। 
संत कबीरदास जी स्वामी रामानंद के योग्य शिष्य थे। वे इस संसार के रोम-रोम में रमने वाले, प्रत्येक अणु-परमाणु में बसने वाले निर्गुण निराकार 'राम' की आराधना करते थे। उन्होंने पालक पिता-माता नीरू-नीमा की आजीविका को ही अपनाया था। कर्मयोगी कबीरजी जुलाहे का काम करते-करते अपने आराध्य के गीत गाया करते थे। अपने काम-काज के सिलसिले में घूमते-फिरते थे। वे लोगों को तरह-तरह के उपदेश देते थे। परवर्ती समय में शिष्यों ने उनकी अमृतोपम वाणियों को लिखित रूप प्रदान किया। महात्मा कबीरदास की रचनाएँ बीजक नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके तीन भाग है. साखी, सबद और रमैनी।
        भाषा पर कबीरदास जी का भरपूर अधिकार था। उनकी काव्य भाषा वस्तुतः तत्कालीन हिंदुस्तानी है, जिसे विद्वानों ने 'सधुक्कड़ी', 'पंचमेल खिचड़ी' आदि कहा है। जनता के कवि कबीरदास ने सरल, सहज बोध गम्य और स्वाभाविक रूप से आये अलंकारों से सजी भाषा का प्रयोग किया है। ज्ञान, भक्ति आत्मा, परमात्मा, माया, प्रेम,
वैराग्य आदि गंभीर विषय उनकी रचनाओं में अत्यंत सुबोध एवं स्पष्ट रूप में व्यक्त हुए है।


7.सप्रसंग व्याख्या करो:
(क) "जाति न पूछो साधु की.... .पड़ा रहन दो म्यान॥

उत्तर : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'आलोक के अंतर्गत कबीर द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है। प्रस्तुत साखी में कबीरदास ने जात-पात तथा ज्ञान की महत्व के बारमें वर्णन किया हैं।
   कबीर दास जी कहते हैं कि साधुओं से उसकी जाति के बारेमें बना नहीं चाहिए। केवल उनके ज्ञान जांच करना चाहिए। क्यों कि जाति-पाति बाहरि आडम्बर है। कबीरदास जी एक उपमा देकर कहा है कि अगर तलवार
रीदना हो तो खरीदने से पहले ग्यान के अंदर रहनेवाले तलवार को अच्छी रह देख लेना चाहिए। क्योंकि तलवार से हमारी रखवाली करनी है म्यान से ही। वैसे ही हम साधु के ज्ञान से हमारी समाज को गढ़ना है, जाति से नहीं।
        यहाँ कवीर दास जी जात-पात के अपेक्षा ज्ञान को अधिक हित्व प्रदान किया है।

(ख) "जिन ढूँढा तिन पाइयाँ..
..रहा किनारे बैठ॥"

उत्तर : प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्यपुस्तक 'आलोक' के अंतर्गत कवि  कबीर दास द्वारा रचित 'साखी' शीर्षक कविता से ली गई है। यहा कबीरदास जी ने भगवान का नाम जप तथा अपना कर्म की महत्व के बारे में प्रकास किया है। चमड़ी लगी होती है, वह मृत पशु की होती है। फिर भी वह साँस लेती है अर्थात हवा को बाहर भीतर करती रहती है। कबीर के कहने का आशाय यह है कि
     कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने भगवान को खोजता है वह - गोताखोर सागर में डूबकी लगाकर जल के अंदर से मोटी निकाल लेता है और श्मशान के समान, सूना, भयावह और मृत प्रायः होता है। ऐसे प्राणी में प्राण
शरीर धर्म का पालन किये जाने पर भी प्रेमहीन जीवित व्यक्ति मृत के समान मिलता है। भगवान प्राप्ति के लिए कोई नियत जगह नहीं ही, अथाह जल में तैर कर या गोता लगाकर भी भगवान का नाम जप कर सकते है। कवि कहता है की कायर लोग डूबने की डर से किनारे बैठ रहते हैं।
         गंभीर चिंतन के पश्चात भगवान की प्राप्ति होती है।

(ग) “जा घट प्रेम न संचरै....साँस लेत बिनु प्रान॥"

उत्तर : प्रस्तुत पंक्तियां हमारी पाठ्यपुस्तक हिन्दी किरण-भाग काव्यखंड के अन्तर्गत कबीरदास द्वारा रचित साखी से ली गई है। प्रस्तुत में कबीरदास जी ने प्रेम की महिमा का वर्णन किया है।
     कबीर कहते हैं कि जिस जीव के हृदय में प्रेम नहीं होता, वह के होता है। प्रेम ही जीवन है, प्रेम के बिना जीवन अधूरा है।
         कबीर ने जीवन में प्रेम के महत्व का वर्णन किया है। कबीर साहित्य में प्रेम का बड़ा ऊँचा स्थान दिया गया है।

(घ) 'काल करे सो आज कर.
.बहुरि करेगो कब॥"

उत्तर : प्रस्तुत साखी में कबीरदास जी ने किसी भी काम को समय से पहले करने का संदेश किया है।
                   कबीर कहते है कि जिस काम को हमें कल करना है उसे आज ही करना चाहिए। उसे कल पर कहकर नहीं टालना चाहिए और जिस काम को आज करना है उस काम को अभी ही करना चाहिए। क्योंकि कोई नहीं जानता कि कल क्या होने वाला है कब प्रलय आ जाय यह कोई नहीं जानता, अतः सभी कामको समय से पहले ही कर लेना चाहिए। उसे कभी भी नहींटालना चाहिए।
                  कवि ने यहां समय को मूल्यवान माना है। उनके अनुसार सभी काम समय से पहले कर लेना चाहिए।


*भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान
1.निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप बताओ :
मिरग, पुहुप, सिष, आखर, मसान, परलय, उपगार, तीरथ

उत्तर : मिरग = मृग
सिष = शिष्य
मसान= श्मशान
तीरभ = तीर्थ
परलय = प्रलय
आखर = अक्षर
उपगार = उपकार

2. वाक्यों में प्रयोग करके निम्नांकित जोड़ों के अर्थ का अंतर
स्पष्ट करो:
मनका-मन का, करका-कर का, नलकी-नल की,
पीलिया-पी लिया, तुम्हारे-तुम हारे, नदी-न दी

उत्तर : (क) मनका : महेश मनका फेर करमंत्र पढ़ रहा है।
मन का : हरि के मन का भ्रम अभी खत्म नहीं हुआ है।

(ख) करका : इस करका में पानी भर दो।
करका : यह समान उसके कर का बना हुआ है।

(ग) नलकी : तुम उस नलकी से पानी पिओ।
नल की : आज-कल गावों में पानी के नल की व्यवस्था हुआ है।

(घ) पीलिया : रहिम पीलिया रोग से ग्रस्त है।
पीलिया : राकेश ने चाय पी लिया है।

(ङ) तुम्हारे : वह तुम्हारे लिए बना हुआ है।
तुम हारे : तुम हारे हुए लगते हो।

(च) नदी: दया एक पहड़ी नदी है।
न दी: मैं नदी कह सकता हूं कि इस बार अबाल आऊँगा।


3. निम्नलिखित शब्दों के लिंग निर्धारित करो:
महिमा, चोट, लोचन, तलवार, ज्ञान, घट, साँस, प्रेम

उत्तर : महिमा = स्त्रीलिंग।
चोट = स्त्रीलिंग
लोचन = स्त्रीलिंग
तलवार = पुंलिंग
घट = पुलिंग
साँस= स्त्रीलिंग
प्रेम = पुलिंग
ज्ञान = पुलिंग

4. निम्नांकित शब्द-समूहों के लिए एक-एक शब्द लिखो:
(क) मिट्टी के बर्तन बनाने वाला व्यक्ति
(ख) जो जल में डूबकी लगाता हो
(ग) जो लोहे के औजार बनाता है
(घ) सोने के गहने बनाने वाला कारीगर
(ङ) विविध विषयों के गंभीर ज्ञान रखने वाला व्यक्ति

उत्तर : (क) मिट्टी के बरतन बनाने वाला व्यक्ति - कुम्हार
(क) भिगी एक तबज्न दनान वाना बाछि-कूमशन ।
(ख) जो जल में डूबकी लगाता हो - गोताखोर

(ग) जो लोहे के औजार बनाता है - लोहार

(घ) सोने के गहने बनाने वाला कारीगर - सोनार

(ङ)विविध विषयों के ज्ञान रखने वाला व्यक्ति - पंडित बहुज


5. निम्नांकित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो :
साईं, पानी, पवन, फूल, सूर्य, गगन, धरती

उत्तर :
साई = ईश्वर, भगवान।
पानी = जल , नीर 
पवन = हवा , समीर 
फूल = पुष्प, कुसुम
सूर्य = रवि , दिबाकर 
गगन = आकाश, आसमान 
धरती = धरा , धरणी 




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