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Chitthiyon Ki Anoothi Duniya -Class 10-Aalok Bhag 2 ( चिट्ठियों की अनूठी दुनिया -Class 10-seba)

 Chitthiyon Ki Anoothi Duniya  -Class 10-Aalok Bhag 2 (   चिट्ठियों की अनूठी दुनिया   -अरविन्द कुमार सिंह-Class 10-seba)   

                 
class x hindi seba
chitthiyon ki anoothi duniya 
               

                                                        चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

विचारों और भावों के आदान-प्रदान मानव के लिए एक अपरिहार्य सामाजिक कार्य है। पहले यह कार्य मौखिक रूप से संपन्न होता था। कालान्तर में लिपि के विकास होने के पश्चात लिखित रूप में यह कार्य होने लगा। 'पत्र लेखन' इसी की एक कड़ी है। प्राचीन काल से ही संदेश के आदान-प्रदान के लिए पत्रों का व्यवहार राजकीय और पारिवारिक क्षेत्रों में होता रहा है। संदेश वाहक के रूप में पत्र का पत्र-वाहक के रूप में कबूतर, हरकारा, डाकिया आदि का महत्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे पत्रों का ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व भी बढ़ा। परन्तु
युग परिवर्तन के साथ-साथ तथा सूचना प्रौद्योगिकी के कारण पत्रों के आदानप्रदान में कुछ कमी आयी। टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स, ई-मेल, इंटरनेट आदि नए-नए माध्यमों के कारण पत्रों का व्यवहार कम होने लगा। परन्तु यह विचारणीय है कि जो अनुभूति और भाव पत्रों से जुड़े होते हैं, वे आधुनिक संचार माध्यमों में भी उसी प्रकार प्राप्त होते हैं या नहीं। गौर से देखने पर यह अनुभूत होता है कि पत्र में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो नए संचार माध्यमों में परिलक्षित नहीं होते। इस लिए पत्रों का महत्व अभी बरकरार है। प्रस्तुत लेख में लेखक श्री अरविंद कुमार सिंह ने इसी तथ्य को उजागर करने का प्रयास किया है।


पत्रों की दुनिया भी अजीबो-गरीब है और उसकी उपयोगिता हमेशा से बनी रही है। पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे
सकता है। पत्र एक नया सिलसिला शुरू करते हैं और राजनीति, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों में तमाम विवाद और नई घटनाओं की जड़ भी पत्र ही होते हैं। दुनिया का तमाम साहित्य पत्रों पर केंद्रित है और मानव सभ्यता के विकास में इन पत्रों ने अनूठी भूमिका निभाई है। पत्रों का भाव सब जगह एक-सा है, भले ही उसका नाम अलग-अलग हो। पत्र को उर्दू में खत, संस्कृत में पत्र, कन्नड़ में कागद, तेलुगु में उत्तरम्, जाबू और लेख तथा तमिल में कडिद कहा जाता है। पत्र यादों को सहेज कर रखते हैं, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। हर एक की अपनी पत्र लेखन कला है और हर एक के पत्रों का अपना दायरा। दुनिया भर में रोज करोड़ों पत्र एक दूसरे को तलाशते तमाम ठिकानों तक पहुँचते हैं। भारत में ही रोज साढ़े चार करोड़ चिट्ठियाँ डाक में डाली जाती हैं जो साबित
करती हैं कि पत्र कितनी अहमियत रखते हैं।


पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1953 में सही ही कहा था कि"हजारों सालों तक संचार का साधन केवल हरकारे (रनर्स) या फिर तेज घोड़े रहे हैं। उसके बाद पहिए आए। पर रेलवे और तार से भारी बदलाव आया। तार ने रेलों से भी तेज गति से संवाद पहुँचाने का सिलसिला शुरू किया। अब टेलीफोन, वायरलेस और आगे रेडार-दुनिया बदल रहा है।"


पिछली शताब्दी में पत्र लेखन ने एक कला का रूप ले लिया। डाक व्यवस्था के सुधार के साथ पत्रों को सही दिशा देने के लिए विशेष प्रयास किए गए। पत्र संस्कृति विकसित करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों में पत्र लेखन का
विषय भी शामिल किया गया। भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में ये प्रयास चले और विश्व डाक संघ ने अपनी ओर से भी काफी प्रयास किए। विश्व डाक संघ की ओर से 16 वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चों के लिए पत्र लेखन
प्रतियोगिताएँ आयोजित करने का सिलसिला सन् 1972 से शुरू किया गया। यह सही है कि खास तौर पर बड़े शहरों और महानगरों में संचार साधनों के तेज विकास तथा अन्य कारणों से पत्रों की आवाजाही प्रभावित हुई है, पर देहाती दुनिया आज भी चिट्ठियों से ही चल रही है। फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल ने चिट्ठियों की तेजी को रोका है पर व्यापारिक डाक की संख्या लगातार बढ़ रही है।


जहाँ तक पत्रों का सवाल है, अगर आप बारीकी से उसकी तह में जाएँ तो आपको ऐसा कोई नहीं मिलेगा जिसने कभी किसी को पत्र न लिखा या न लिखाया हो या पत्रों का बेसब्री से जिसने इंतजार न किया हो। हमारे सैनिक तो
पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते हैं, उसकी कोई मिसाल ही नहीं। एक दौर था जब लोग पत्रों का महीनों इंतजार करते थे पर अब वह बात नहीं। परिवहन साधनों के विकास ने दूरी बहुत घटा दी है। पहले लोगों के लिए संचार का इकलौता साधन चिट्ठी ही थी पर आज और भी साधन विकसित हो चुके हैं।

आज देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने पुरखों की चिट्ठियों को सहेज और संजोकर विरासत के रूप में रखे हुए हों या फिर बड़े-बड़े लेखक, पत्रकारों, उद्यमी, कवि, प्रशासक, संन्यासी या किसान, इनकी पत्र रचनाएँ
अपने आप में अनुसंधान का विषय हैं। अगर आज जैसे संचार साधन होते तो पंडित नेहरू अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को फोन करते, पर तब पिता के पत्र पुत्री के नाम नहीं लिखे जाते जो देश के करोड़ों लोगों को प्रेरणा देते हैं। पत्रों को तो आप सहेजकर रख लेते हैं पर एसएमएस संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हैं। कितने संदेशों को आप सहेज कर रख सकते हैं ? तमाम महान हस्तियों की तो सबसे बड़ी यादगार या धरोहर उनके द्वारा लिखे गए पत्र ही हैं। भारत में इस श्रेणी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सबसे आगे रखा जा सकता है। दुनिया के तमाम संग्रहालय जानी-मानी हस्तियों के पत्रों का अनूठा संकलन भी है। तमाम पत्र देश, काल और समाज को जानने-समझने का असली पैमाना है। भारत में आजादी के पहले महासंग्राम के दिनों में जो कुछ अंग्रेज अफसरों ने
अपने परिवारजनों को पत्र में लिखे, वे आगे चलकर बहुत महत्व की पुस्तक तक बन गए। इन पत्रों ने साबित किया कि यह संग्राम कितनी जमीनी मजबूती लिए हुए था।


महात्मा गांधी के पास दुनिया भर से तमाम पत्र केवल महात्मा गांधीइंडिया लिखे आते थे और वे जहाँ भी रहते थे वहाँ तक पहुँच जाते थे। आजादी के आंदोलन की कई अन्य दिग्गज हस्तियों के साथ भी ऐसा ही था। गांधी जी के पास देश-दुनिया से बड़ी संख्या में पत्र पहुँचते थे पर पत्रों का जवाब देने के मामले में उनका कोई जोड़ नहीं था। कहा जाता है कि जैसे ही उन्हें पत्र मिलता था, उसी समय वे उसका जवाब भी लिख देते थे। अपने हाथों से ही ज्यादातर पत्रों का जवाब देते थे। जब लिखते-लिखते उनका दाहिना हाथ दर्द करने लगता था तो वे बाएँ हाथ से लिखने में जुट जाते थे। महात्मा गांधी ही नहीं आंदोलन के तमाम नायकों के पत्र गाँव-गाँव में मिल जाते हैं। पत्र भेजने वाले लोग उन पत्रों को किसी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं मानते हैं और कई लोगों ने तो उन पत्रों को फ्रेम कराकर रख लिया है। यह है पत्रों का जादू। यही नहीं, पत्रों के आधार पर ही कई भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं।

वास्तव में पत्र किसी दस्तावेज से कम नहीं हैं। पंत के दो सौ पत्र बच्चन के नाम और निराला के पत्र हमको लिख्यौ है कहा तथा पत्रों के आईने में दयानंद सरस्वती समेत कई पुस्तकें आपको मिल जाएँगी। कहा जाता है। प्रेमचंद खास तौर पर नए लेखकों को बहुत प्रेरक जवाब देते थे तथा पत्रों के जवाब में वे बहुत मुस्तैद रहते थे। इसी प्रकार नेहरू और गांधी के लिखे गए रवींद्रनाथ टैगोर के पत्र भी बहुत प्रेरक हैं। 'महात्मा और कवि' के नाम से महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच सन् 1915 से 1941 के बीच पत्राचार का संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसमें बहुत से नए तथ्यों और उनकी मनोदशा का लेखा-जोखा मिलता है।


पत्र व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आजादी के बाद ही हुआ है। तमाम सरकारी विभागों की तुलना में सबसे ज्यादा गुडविल डाक विभाग की ही है। इसकी एक खास वजह यह भी
है कि यह लोगों को जोड़ने का काम करता है। घर-घर तक इसकी पहुंच है। संचार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी चिट्ठी-पत्री की हैसियत बरकरार है। शहरी इलाकों में आलीशान हवेलियाँ हों या फिर झोपड़पट्टियों में रह रहे लोग, दुर्गम जंगलों से घिरे गाँव हों या फिर बर्फवारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग, समुद्र तट पर रह रहे मछुआरे हों या फिर रेगिस्तान की ढाणियों में रह रहे लोग, आज भी खतों का ही सबसे अधिक बेसब्री से इंतजार होता है। एक दो नहीं, करोड़ों लोग खतों और अन्य सेवाओं के लिए रोज भारतीय डाकघरों के दरवाजों तक पहुँचते हैं और इसकी बहु आयामी भूमिका नजर आ रही है। दूर देहात में लाखों गरीब घरों में चूल्हे मनीआर्डर अर्थव्यवस्था से ही जलते हैं। गाँवों या गरीब बस्तियों में चिट्ठी या मनीआर्डर लेकर पहुंचने वाला डाकिया देवदूत के रूप में देखा जाता है।
                                                               
                                                                                                                              -श्री अरविंद कुमार सिंह


                                    अभ्यासमाला

. बोध एवं विचार
1. सही विकल्प का चयन करो :
(क) पत्र को उर्दू में क्या कहा जाता है ?
(अ) खत
(आ) चिट्ठी
(इ) कागद
(ई) लेख

उत्तर: (अ) खत।  

(ख) पत्र लेखन है
(अ) एक तरीका
(आ) एक व्यवस्था
(इ) एक कला
(ई )एक रचना

उत्तर: (इ) एक कला। 

(ग) विश्व डाक संघ ने पत्र लेखन की प्रतियोगिता शुरू की       
(अ)  1970 से               
 (आ) सन् 1971 से
(इ) सन् 1972 से           
 (ई)  सन् 1973 से

उत्तर: (इ) सन् 1972 से। 

(घ) महात्मा गाँधी के पास दुनियाभर से तमाम पत्र किस पते पर आते थे
(अ) मोहन दास करमचन्द गाँधी-भारत
(आ) महात्मा गाँधी-भारत
(इ) बापू जी-इंडिया
(ई) महात्मा गाँधी-इंडिया

उत्तर: (ई) महात्मा गाँधी-इंडिया। 

(ड.) तमाम सरकारी विभागों की तुलना में सबसे ज्यादा गुडविल किसकी है
(अ) रेल विभाग
(आ) डाक विभाग
(इ) शिक्षा विभाग
 (ई) गृह विभाग

उत्तर: (आ) डाक विभाग।

2. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):

(क) पत्र ऐसा क्या काम कर सकता है, जो संचार का आधुनिकतम साधन भी
नहीं कर सकता?

उत्तर: दुनिया का तमाम साहित्य पत्तों पर केंद्रित है और मानव सभ्यता विकास में इन प्रत्रों ने अनुठी भूमिका निभा सकता है, पर संसार का आधुनिकता साधन नहीं कर सकता।

(ख) चिट्ठियों की तेजी अन्य किन साधनों के कारण बाधा प्राप्त हुई है ?

उत्तर: युग के परिवर्तन के साथ साथ तथा सुचना प्रौछोगिकी के कारण पत्रों के आदान-प्रदान में कुछ कर्म आयी। टेलीफोन, मोबाईल, फैक्स, ई-मेल. इंटरनेट   आदि नये नये माध्यमों के कारण पत्र बाधा प्राप्त हुई हैं।

(ग) पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश क्यों नहीं दे सकता?

उत्तर: पत्र जैसा संतोष फोन या एस एम एस का संदेश नहीं दे सकता। क्योंकि त्र यादों को सहेज कर रखते हैं। संतोष फोन या एस एम एस नही रख सकते।

(घ) गाँधीजी के पास देश-दुनिया से आये पत्रों का जवाब वे किस प्रकार देते थे?

उत्तर:  गांधीजी के पास देश दुनिया से आये पत्रों का जवाब वे जैसे ही पत्र मिलता था, उसी समय वे उसका जवाब भी लिख देते थे।

(ङ)कैसे लोग अब भी बहुत ही उत्सुकता से पत्रों का इंतजार करते हैं ?

उत्तर:  आलीशान हवेलिया में रहे लोग, झोपड़पट्टियों में रह. जंगलों से घिर गाँव हो या फिर वर्फवारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग,समा। तट पर रह रहे मधुआरे हो या फिर रेगिस्थान की ढाणियों में रह रहे लोग भी बहुत ही उत्सुकता से पत्रों का इंतजार करते हैं।

3. उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में):
(क) पत्र को खत, कागद, उत्तरम, लेख इत्यादि कहा जाता है। इन शब्दों से संबंधित भाषाओं के नाम बताओ।

उत्तर:

(ख) पाठ के अनुसार भारत में रोज कितनी चिट्ठियाँ डाक में डाली जाती है और इससे क्या साबित होता है?

उत्तर:   पाठ के अनुसार भारत में रोज साढ़े चार करोड़ चिट्ठियाँ डाक में डाली जाती हैं और इस से यह सावित होता है कि पत्र कितनी अहमियत रखते हैं।

(ग) क्या चिट्ठियों की जगह कभी फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल ले सकते हैं?

उत्तर:   फैक्स, ई-मेल, टेलिफोन तथा मोबाइल आदि साधनों के कारण पत्रों के आदान प्रदान में कुछ कमी आयी। पर पुर्णरुप में ये साधनों ने चिट्ठियाँ की जगह कभी नहीं ले सकते हैं।

(घ) किनके पत्रों से यह पता चलता है कि आजादी की लड़ाई बहुत ही मजबूती से लड़ी गयी थी?

उत्तर:  आजादी के अन्दोलन के तमाम नायकों के पत्र गाँव-गाँव में मिल जाते है। इन पत्रों से यह पता चलता है कि आजादी की लड़ाई बहुत ही मजबुती से लड़ी गयी थी।

(ङ) संचार के कुछ आधुनिक साधनों के नाम उल्लेख करो।

उत्तर: 


4. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) पत्र लेखन की कला के विकास के लिए क्या-क्या प्रयास हुए?

उत्तर:   पत्र लेखन की कला के विकास के लिए पिछली शताब्दी में कड़ी प्रयास हुए, जिससे पत्र लेखन ने एक कला का रुप ले लिया। डाक व्यवस्था के सुधार के साथ पत्रों को सही दिशा देने के लिए विशेष प्रयास किए गए। पत्र संस्कृति विकसित करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमी में पत्र लेखन का विषय शामिल किया गया। भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में ये प्रयास चले और विश्व डाक संध ने अपनी ओर से भी काफी प्रयास किए। विश्व डाक संध की ओर से 16 वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चो के लिए पत्र लेखन प्रतियोगिताएं आयोजन करने का মিলভিলা মন 1972 ম ঘুষ কি যথা।

(ख) वास्तव में पत्र किसी दस्तावेज से कम नहीं है-कैसे?

उत्तर:  वास्तव में पत्र किसी दस्तावेज से कम नहीं हैं। पंत के दो सौ पत्र बच्चन के नाम और निराला के पत्र हमको लिखे है कहा तथा पत्रों के आईने में दयानंद सरस्वती समेत कई पुस्तकें मिलता है। कहा जाता है कि प्रेमचंद खास तौर पर नए लेखकों की बहुत प्रेरक जवाब देते थे तथा पत्रों के जवाब में वे बहुत तत्पर रहते थे। इसी प्रकार नेहरु और गांधी के लिखे गए रवीद्र नाथ ठाकुर के पत्र भी बहुत प्रेरक है। महात्मा और कवि' के नाम से महात्मा गांधी और रवीद्र ठाकुर के बीच सन 1915 के बीच पत्राचार का संग्रह प्रकाशित हुआ है जिसमें बहुत से
नए तथ्यों और उनकी मनोदशा का लेखा जोखा मिलता है। इससे पता चलता है कि वास्तव में पत्र किसी दस्तावेज से कम नहीं है।

(ग) भारतीय डाकघरों की बहुआयामी भूमिका पर आलोकपात करो।

उत्तर:    पत्र व्यवहार की पंरपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आजादी के बाद ही हुआ। तमाम सरकारी विभागो को तुलना में सबसे ज्यादा गुडविल डाक विभाग की ही है। संसार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी चिट्ठी-पत्री की हैसियत बरकरार है। शहरी इलाकों में आलीशान हवेलियाँ हो या फिर झोपड़पट्टियों में रह रहे लोग, दुर्गम जंगली में घिरे गाँव हो या फिर बर्फवारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग, समुद्र तट रह रहे मछुआरेहोया फिर रेगिस्तान की ढाणियों में रह रहे लोग आज भीखतों का ही सबसे अधिक बेसब्री से इंतजार होता है । एक दो नही, करोड़ो लोग खतों और अन्य सेवाओं के लिए रोज भारतीय डाकघरों के दरवाजे तक पहुँचते है और इसकी बह आयामी भूमिका नजर आ रही है।



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