Sadak Ki Baat -Class 10-Aalok Bhag 2 ( सड़क की बात - रवींद्रनाथ ठाकुर -Class 10-seba)

 Sadak Ki Baat  -Class 10-Aalok Bhag 2 ( सड़क की बात -  रवींद्रनाथ ठाकुर -Class 10-seba)   

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sadak ki baat 


                                                                 रवींद्रनाथ ठाकुर
                                                                   (1861-1941)

            'विश्व-कवि' की आख्या से विभूषित गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर उन प्रातः स्मरणीय मनीषियों की परंपरा में आते हैं, जिन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को अपने समग्र रूप में चित्रित किया। आपने अपनी रचनाओं में न सिर्फ भारत की गौरवमयी सभ्यतासंस्कृति को अभिव्यक्ति दी, बल्कि विश्व मानवतावादी दृष्टि से पश्चिमी सभ्यतासंस्कृति के उज्ज्वल तत्वों को अपनाने का आह्वान भी किया। आप मूलत: बांग्ला के कवि-कलाकार थे, परन्तु अपनी उदारवादी मानवतावादी दृष्टि के कारण आपने क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता का, फिर राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीयता एवं विश्वबंधुत्व का स्पर्श किया। इस प्रकार वे पहले बंगाल के, फिर भारतवर्ष के और फिर संपूर्ण विश्व के चहेते बने। 
              कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई, 1861 ई. को कोलकाता के जोरासाँको में एक संपन्न एवं प्रतिष्ठित बांग्ला परिवार में हुआ था। आपके पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर जी दार्शनिक प्रवृत्ति के प्रख्यात समाज-सुधारक थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की शिक्षा-दीक्षा मुख्यतः घर पर ही हुई। काव्य, संगीत, चित्रकला, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक सुधार एवं राजनीतिक सुरुचि का वातावरण उन्हें परंपरा और परिवार से मिला। उन्होंने प्रकृति एवं जीवन की खुली पुस्तक को लगन के साथ पढ़ा। स्वाध्याय के बल पर आपने विविध विषयों का विपुल ज्ञान प्राप्त कर लिया। सत्रह वर्ष की अवस्था में आप इंग्लैंड गए। वहाँ आपको कई सुप्रतिष्ठित अंग्रेज कवि-साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ और वे पश्चिमी विचारधारा के आलोक से दीप्त होकर स्वदेश वापस आए।
              काव्य प्रतिभा के धनी रवींद्रनाथ ठाकुर ने सात वर्ष की कोमल अवस्था में ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था। तब से लेकर देहावसान के समय तक आपकी अमर लेखनी बराबर चलती रही। आपने कई हजार कविताओं, गीतों, कहानियों, रूपकों (भावनाट्य) एवं निबंधों की रचना की। आपने उपन्यास भी लिखे, जिनमें 'गोरा' और 'घरेबाइरे' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आपके द्वारा रचित कहानियों में से काबुलीवाला' एक कालजयी कहानी है। कवि-शिरोमणि रवींद्रनाथ ठाकुर की कीर्ति का आधार-स्तंभ है उनका काव्य-ग्रंथ 'गीतांजलि', जिस पर आपको सन् 1913 ई. में साहित्य का । नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। आपकी अन्य रचनाओं में 'मानसी', 'संध्या-संगीत', 'नैवेद्य', 'बलाका', 'क्षणिका' आदि अन्यतम हैं। आपके द्वारा विरचित सैकड़ों गीतों | से खींद्र-संगीत नामक एक निराली संगीत-धारा ही बह निकली है। आपके द्वारा रचित 'जन गण मन....' भारतवर्ष का राष्ट्रीय संगीत है, तो आपकी ही रचना 'आमार सोणार | चाँद आदि के प्रति भी भरपूर आकर्षण था। उनकी सूक्ष्म एवं पैनी दृष्टि जड़ और चेतन दोनों प्रकार के पदार्थों के अंतरतम तक पहुँच जाती थी। आपके द्वारा रचित 'सड़क की बात वस्तुतः सड़क की आत्मकथा है। लेखक ने इसमें सड़क का मानवीकरण किया हैं। सड़क अपनी आप-बीती अथवा राम-कहानी स्वयं सुना रही है। दरअसल इस पाठ में लेखक ने अपनी सूक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण करके उसकी आकांक्षा, स्थिति एवं उनके मनोभावों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि सड़क की बातें जीवंत हो उठी हैं। यह एक मनोरम आत्मकथात्मक निबंध है। इसमें सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी उजागर हुई हैं। बांग्ला' पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश का राष्ट्रीय संगीत है। 
कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में बोलपुर के निकट 'शांतिनिकेतन' नाम के एक शैक्षिक-सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी। यह केन्द्र गुरुदेव के सपनों का मूर्त रूप रहा और आगे यह विश्व-भारती विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आपने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी रुचि ली थी। शांतिनिकेतन में आने पर मोहनदास करमचंद गाँधी को आपने 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में अपना मत देते हुए गुरुदेव ने कहा था-"उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए जो देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती हो, अर्थात् हिन्दी।" 7 अगस्त, 1941 ई. को इस महान पुण्यात्मा का स्वर्गवास हुआ।
              कवि, गीतकार, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, संगीतकार, कलाकार, समाज-सुधारक, शिक्षा-संस्कृतिप्रेमी और राजनीतिज्ञ की बहुमुखी प्रतिभा के अधिकारी होते हुए भी गुरुदेव रवींद्रनाथ मूलतः कवि-हृदय के थे। उनके कोमल हृदय में अगर विश्वमानवता के प्रति प्रेम, करुणा और सहानुभूति थी, तो मानवेतर प्राकृतिक
उपकरणों, जैसे- पेड़-पौधे, नदी-निर्झर, पशु-पक्षी, वन-उपवन, फूल-तारे, सूरजचाँद आदि के प्रति भी भरपूर आकर्षण था। उनकी सूक्ष्म एवं पैनी दृष्टि जड़ और चेतन दोनों प्रकार के पदार्थों के अंतरतम तक पहुँच जाती थी। आपके द्वारा रचित 'सड़क की बात' वस्तुतः सड़क की आत्मकथा है। लेखक ने इसमें सड़क का मानवीकरण किया है। सड़क अपनी आप-बीती अथवा राम-कहानी स्वयं सुना रही है। दरअसल इस पाठ में लेखक ने अपनी सूक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण करके उसकी आकांक्षा, स्थिति एवं उनके मनोभावों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि सड़क की बातें जीवंत हो उठी हैं। यह एक मनोरम आत्मकथात्मक निबंध है। इसमें सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी उजागर हुई हैं।


                                   सड़क की बात


मैं सड़क हूँ। शायद किसी के शाप से चिरनिद्रित सुदीर्घ अजगर की भाँति वन-जंगल और पहाड़-पहाड़ियों से गुजरती हुई पेड़ों की छाया के नीचे से और दूर तक फैले हुए मैदानों में ऊपर से देश-देशांतरों को घेरती हुई बहुत
दिनों से बेहोशी की नींद सो रही हूँ। जड़ निद्रा में पड़ी-पड़ी मैं अपार धीरज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप की आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही हूँ। हमेशा से जहाँ-तहाँ स्थिर हूँ, अविचल हूँ, हमेशा से एक ही करवट सो रही हूँ, इतना भी सुख नहीं कि अपनी इस कड़ी और सूखी सेज पर एक भी मुलायम हरी घास या दूब डाल सकूँ। इतनी भी फुरसत नहीं कि अपने सिरहाने के पास एक छोटा-सा नीले रंग का वनफूल भी खिला सकूँ।


मैं बोल नहीं सकती पर अंधे की तरह सब कुछ महसूस कर सकती हूँ। दिन-रात पैरों की ध्वनि, सिर्फ पैरों की आहट सुना करती हूँ। अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ, मैं
समझ जाती हूँ कि कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है, कौन काम से जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, कौन उत्सव में जा रहा है और कौन श्मशान को जा रहा है। जिसके पास सुख की घर-गृहस्थी है, स्नेह की छाया है, वह हर कदम पर सुख की तस्वीर खींचता है, आशा के बीज बोता है। जान पड़ता है, जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़ते हैं, वहाँ-वहाँ क्षण भर में मानो एक-एक लता अंकुरित और पुष्पित हो उठेगी। जिसके पास घर नहीं,
आश्रय नहीं, उसके पदक्षेप में न आशा है, न अर्थ है, उसके कदमों में न दायाँ है, न बायाँ है, उसके पैर कहते हैं, मैं चलूँ तो क्यों, और ठहरूँ तो किसलिए? उसके कदमों से मेरी सुखी हुई धूल मानो और सूख जाती है।


संसार की कोई भी कहानी मैं पूरी नहीं सुन पाती। आज सैकड़ों-हजारों वर्षों से मैं लाखों-करोड़ों लोगों की कितनी हँसी, कितने गीत, कितनी बातें । सुनती आई हूँ। पर थोड़ी-सी बात सुन पाती हूँ। बाकी सुनने के लिए जब
कान लगाती हूँ तब देखती हूँ कि वह आदमी ही नहीं रहा । इस तरह न जाने कितने युगों की कितनी टूटी-फूटी बातें और बिखरे हुए गीत मेरी धूल के साथ धूल बन गए हैं और धूल बनकर अब भी उड़ते रहते हैं।


वह सुनो गा रही है-कहते-कहते कह नहीं पाई । आह, ठहरो, जरा गीत को पूरा कर जाओ, पूरी बात तो सुन लेने दो मुझे, पर कहाँ ठहरी वह?गाते-गाते न जाने कहाँ चली गई ? आखिर तब मैं सुन ही नहीं पाई । बस आज आधी रात तक उसकी पग-ध्वनि मेरे कानों में गूंजती रहेगी। मन ही म सोचूंगी कौन थी वह? कहाँ जा रही थी न जाने? जो बात न कह पाई उसी को फिर कहने गई । अब की बार जब फिर उससे भेंट होगी, वह जब मुँह
उठाकर इसके मुँह की तरफ ताकेगा, तब "कहते-कहते" फिर "कह नहीं पाई" तो?

समाप्ति और स्थायित्व शायद कहीं होगा, पर मुझे तो नहीं दिखाई देता। एक चरण चिह्न को भी तो मैं ज्यादा देर तक नहीं रख सकती। मेरे ऊपर लगातार चरण-चिह्न पड़ रहे हैं, पर नए पाँव आकर पुराने चिह्नों को पोंछ
जाते हैं। जो चला जाता है वह तो पीछे कुछ छोड़ ही नहीं जाता। कदाचित उसके सिर के बोझ से कुछ मिलता भी है तो हजारों चरणों के तले लगातार कुचला जाकर कुछ ही देर में वह धूल में मिल जाता है।

मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सबका उपाय मात्र हैं। मैं किसी का घर नहीं हूँ, पर सबको घर ले जाती हूँ। मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता। मुझ पर कोई खड़ रहना पसंद नहीं करता। जिनका घर बहुत दूर है, वे मुझे ही कोसते हैं और शाप देते रहते हैं । मैं जो उन्हें परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वार तक पहुंचा देती हूँ, इसके लिए कृतज्ञता कहाँ पाती हूँ? वे अपने घर आराम करते हैं, घर पर आनंद मनाते हैं, घर में उनका सुख-सम्मिलन होता है, बिछुड़े हुए सब मिल जाते हैं, और मुझ पर केवल थकावट का भाव दरसाते हैं, केवल अनिच्छाकृत श्रम हुआ समझते हैं, मुझे केवल विच्छेद का कारण मानते हैं। क्या इसी तरह बार-बार दूर ही से घर के झरोखे में से पंख पसार कर बाहर आती हुई मधुर हास्य-लहरी मेरे पास आते ही शून्य में विलीन हो जाया करेगी ? घर के उस आनंद का एक कण भी, एक बूंद भी मैं नहीं पाऊँगी?

कभी-कभी वह भी पाती हूँ। छोटे-छोटे बच्चे जो हँसते-हँसते मेरे पास आते हैं और शोरगुल मचाते हुए मेरे पास आकर खेलते हैं, अपने घर का आनंद वे मेरे पास ले आते हैं। उनके पिता का आशीर्वाद और माता का स्नेह
घर से बाहर निकल कर, मेरे पास आकर सड़क पर ही मानो अपना घर बना लेता है। मेरी धूल में वे स्नेह दे जाते हैं, प्यार छोड़ जाते हैं। मेरी धूल को वे अपने वश में कर लेते हैं और अपने छोटे-छोटे कोमल हाथों से उसकी ढेरी
पर हौले-हौले थपकियाँ दे-देकर परम स्नेह से उसे सुलाना चाहते हैं। अपना निर्मल हृदय लेकर बैठे-बैठे वे उसके साथ बातें करते हैं। हाय-हाय, इतना स्नेह, इतना प्यार पाकर भी मेरी यह धूल उसका जवाब तक नहीं देत पाती ।
मेरे लिए कैसा शाप है यह!

छोटे-छोटे कोमल पाँव जब मेरे ऊपर से चले जाते हैं, तब अपने को मैं बड़ी कठिन अनुभव करती हूँ, मालूम होता है उनके पाँवों में लगती होगी। उस समय मुझे कुसुम कली की तरह कोमल होने की साध होती है। अरुण चरण ऐसी कठोर धरती पर क्यों चलते हैं ? किंतु, यदि न चलते तो शायद कहीं भी हरी-हरी घास पैदा न होती।

प्रतिदिन नियमित रूप से जो मेरे ऊपर चलते हैं, उन्हें मैं अच्छी तरह पहचानती हूँ। पर वे नहीं जानते कि उनके लिए मैं कितनी प्रतीक्षा किया करती हूँ। मैं मन ही मन कल्पना कर लेती हूँ। बहुत दिन हुए, ऐसी ही एक
प्रतिमा अपने कोमल चरणों को लेकर दोपहर को बहुत दूर से आती, छोटेछोटे दो नूपुर रूनझुन करके उसके पाँव में रो-रोकर बजते रहते। शायद उसके ओठ बोलने के ओठ न थे, शायद उसकी बड़ी-बड़ी आँखें संध्या के
आकाश की भाँति म्लान दृष्टि से किसी के मुँह की ओर देखती रहती।


ऐसे कितने ही पाँवों के शब्द नीरव हो गए हैं। मैं क्या उनकी याद रख सकती हूँ ? सिर्फ उन पाँवों की करुण नूपुर-ध्वनि अब भी कभी-कभी याद आ जाती है। पर मुझे क्या घड़ी भर भी शोक या संताप करने की छुट्टी मिलती
है? शोक किस-किसके लिए करें? ऐसे कितने ही आते हैं और चले जाते हैं।

उफ कैसा कड़ा धाम है! एक बार साँस छोड़ती हूँ और तपी हुई धूल सुनील आकाश को धुआँधार करके उड़ी चली जाती है। अमीर और गरीब, जन्म और मृत्यु सब कुछ मेरे ऊपर एक ही साँस में धूल के स्रोत की तरह
उड़ता चला जा रहा है। इसलिए सड़क के न हँसी है, न रोना। मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ, और पड़ी रहूँगी।


[अभ्यासमाला]

. बोध एवं विचार
1. एक शब्द में उत्तर दो :
(क) गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर किस आख्या से विभूषित हैं?

उत्तर : विश्व कवि  ৷

(ख) रवींद्रनाथ ठाकुर जी के पिता का नाम क्या था?

उत्तर : देवेंद्रनाथ ठाकुर ৷

(ग) कौन-सा काव्य-ग्रंथ रवींद्रनाथ ठाकुर जी की कीर्ति का आधार-स्तंभ है?

उत्तर : 'गीतांजलि' ৷

(घ) सड़क किसकी आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही है?

उत्तर : शाप  की  आखिरी  घडियों  का।

(ङ) सड़क किसकी तरह सब कुछ महसूस कर सकती है?

उत्तर : अंधे  की  तरह  ৷

2.पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
(क) कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तर :  कविगुरु रबींद्र नाथ ठाकुर का जन्म कोलकाता के जोरासाँकी में एक बांग्ला परिवार में हुआ था।

(ख) गुरुदेव ने कब मोहनदास करमचंद गाँधी को 'महात्मा' के रूप में संबोधित किया था?

उत्तर : शातिनिकेतन में आने पर मोहनदास करमचंद गांधी को गुरुदेव ने महात्मा के रुप में संबोधित किया था।

(ग) सड़क के पास किस कार्य के लिए फुरसत नहीं है?

उत्तर : सड़क को अपने सिरहाने के पास एक छोटा सा नीले रंग का बनफूल खिलाने के लिए फूरसत नहीं  है।

(घ) सड़क ने अपनी निद्रावस्था की तुलना किससे की है?

उत्तर : सड़क ने अपनी निद्रावस्था की तुलना एक अजगर से की है।

(ङ) सड़क अपनी कड़ी और सूखी सेज पर क्या नहीं डाल सकती?

उत्तर : सड़क अपनी कड़ी और सूखी सेज पर एक भी मुलायम हरी घास था दुव नहीं डाल सकती।


3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):
(क) रवींद्रनाथ ठाकुर जी की प्रतिभा का परिचय किन क्षेत्रों में मिलता है?

उत्तर : रवींद्रनाथ ठाकुर जी की प्रतिभा का परिचय काव्य क्षेत्रों में मिलता है। वह सात वर्ष की कोमल अवस्था में ही कविता लिखना आरंभ कर दिया था ৷

(ख) 'शांतिनिकेतन' के महत्व पर प्रकाश डालो।

उत्तर : कवि गुरु रवींद्र नाथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में बोलपुर के निकट 'शांति निकेतन' नाम के एक शैक्षिक सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की थी। आगे यह विश्व भारती विश्व विद्यालय के रुप में प्रसिद्ध हुआ।

(ग) सड़क शाप-मुक्ति की कामना क्यों कर रही है?

उत्तर : सड़क शाप मुक्ति की कामना इसलिए कर रही है कि वह किसी के शाप से चिरनिद्रत सुदीर्घ अजगर की भाँति बन जंगल, देश-देशांतरी को घेरती हुई बहत दिनों से बेहोशी की नींद सो रही है। जड़ निंद्रा में पड़कर अपार धीरज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप को आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही है।

(घ) सुख की घर-गृहस्थी वाले व्यक्ति के पैरों की आहट सुनकर सड़क क्या समझ जाती है?

उत्तर : सुख की घर-गृहस्थी वाले व्यक्ति पैरों की आहत सुनकर सड़क समझ जाती है कि जिसके पास सुख की घर-गृहस्थी है, स्नेह की छाया है, वह हर कदम पर सुख की तस्वीर खींचता है, आशा के बीज बोता है।


(ङ) गृहहीन व्यक्ति के पैरों की आहट सुनने पर सड़क को क्या बोध होता है?

उत्तर :  गृहहीन व्यक्ति की पैरों की आहट सुनने पर सड़क को यह बोध होता है कि जिसके पास घर नही, आश्रय नही है, उसके पदक्षेप में न आशा, न अर्थ है।

(च) सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण-चिह्न को क्यों ज्यादा देर तक नहीं देख सकती?

उत्तर : सड़क अपने ऊपर पड़े एक चरण-चिह्न को इसलिए ज्यादा देर तक नहीं देख सकती कि उसके ऊपर लगातार चरण-चिह्न पड़ रहे हैं, पर नए पाव आकर पुराने चिह्नों को पोंछ देते हैं।

(छ) बच्चों के कोमल पाँवों के स्पर्श से सड़क में कौन-से मनोभाव बनते हैं?

उत्तर : छोटे छोटे कोमल पाँव जब सड़क के उपर से चले जाते है, तब अपने को सड़क बड़ी कठिन अनुभव करता है। उस समय सड़क को कुसुम कली की तरह कोमल होने की साध होती है।

(ज) किसलिए सड़क को न हँसी है, न रोना?

उत्तर : सड़क के ऊपर से कितने ही लोग आते है और तरी हुई धूल की रतह सुनील आकाश को धुआधार करकें चली जाती है। अमीर और गरीब, जन्म और मृत्यु, सब कुछ धूल के स्त्रोट की तरह उड़ता चला जा रहा है। इसलिए सड़क की न हँसी है, न रोना।

(झ) राहगीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के संदर्भ में सड़क ने क्या कहा है?

उत्तर : राह गीरों के पाँवों के शब्दों को याद रखने के सन्दर्भ में सड़क ने कहा कि ऐसे कितने ही पावो के शब्द नीख हो गए है। सिर्फ उन पाँवों की करुण नूपुर-ध्वनि अब भी कभी-कभी याद आ जाती है, जो एक दिन दोपहर को बहुत दूर से आती। छोटे-छोटे दो नूपुर रुनझुन करके उसके पाँव में रो रो कर बजते रहते।

4. संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 50 शब्दों में):
(क) जड़ निद्रा में पड़ी सड़क लाखों चरणों के स्पर्श से उनके बारे में क्याक्या समझ जाती है?

उत्तर :  सड़क जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदय को पढ़ लेती है, वह समझ जाती है कि कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है, कौन काम से जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, कौन उत्सव जा रहा है और कौन श्मशान को जा रहा है।

(ख) सड़क संसार की कोई भी कहानी क्यों पूरी नहीं सुन पाती?

उत्तर :  सड़क संसार की कोई भी कहानी पूरी नहीं सुन पाती। कारण लोग  सड़क से चलते चलते अपनी मन की बातें करती चली जाती है। पर थोड़ी सी बात सुन पाती। बाकी सुनने के लिए जब वह कान लगाती है कि वह आदमी ही नहीं रहा । इस तरह न जाने कितनें युगों की कितनी टुटी-फूटी बातें और बिखरे हुए गीत सड़क की धूल के धूल बन गए हैं।

(ग) “मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हूँ। सबका उपाय मात्र हूँ।" -सड़क ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर : “मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं है। सबका उपाय मात्र हैं।" -- ऐसा कहने का कारण यह है कि सड़क किसी का घर नही। पर सबको घर ले जाने का साधन मात्र है। सड़क को दिन रात यही संताप सताता रहता है कि उस पर कोई तबीयत से कदम रखना नहीं चाहता। उस पर खड़ा होना नहीं चाहता। जिनका घर दूर है, वह सड़क को कोसता है, शाप दोता है। पर कृतज्ञता कभी नहीं देता ।

(घ) सड़क कब और कैसे घर का आनंद कभी-कभी महसूस करती है?

उत्तर : जब छोटे छोटे बच्चे जो हंसते हँसते सड़क के पास आते है और शोरगुल प्रचाते हुए सड़क पर आकर खेलते हैं, अपने घर का आनंद सड़क पर ले आते हैं, तब सड़क घर का आनंद महसुस करती हैं।

(ङ) सड़क अपने ऊपर से नियमित रूप से चलने वालों की प्रतीक्षा क्यों करती है?

उत्तर : प्रतिदिन नियमित रुप से जो सड़क के ऊपर चलते हैं, उन्हें वह अच्छी तरह पहचानती है। इसलिए वह अपने परिचित लोगों की प्रतीक्षा करती है।

5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में):
(क) सड़क का कौन-सा मनोभाव तुम्हें सर्वाधिक हृदयस्पर्शी लगा और क्यों?

उत्तर : सड़क का यह मनोभाव मुझे सर्वाधिक हृदय स्पर्शी लगा --- शायद किसी के शाप से चिरनिद्रित सुदीर्घ अजगर की भाँति बन संगल और पहाड़ पहाड़ियों से गुजरती हुई पैड़ों की छाया के नीचे से और दुर तक फैले हुए मैदानों में ऊपर से देश-देशांतरों को धरती हुई बहुत दिनों से बेहोशी की नीदं सो रही हुँ। जड़ निद्रा में पड़ी पड़ी मैं अपार धीराज के साथ अपनी धूल में लोटकर शाप की आखिरी घड़ियों का इंतजार कर रही हुँ। हमेशा अबिचल हुँ, एक ही करवट सो रही हुँ। इतना भी सुख नहीं कि अपनी इस कड़ी और सूखी सेज पर एक भी
मुलायम हरी घास था दूब डाल सकूँ। इतनी भी फूरसत नही कि अपने सिरहाने के पास एक छोटा सा नीले रंग का बनफूल भी खिला सकूँ। सड़क का उक्त मनोभाव मुझे हृदय स्पर्शी लगने का कारण यह है कि
इस में लेखक ने अपनी छुक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण कि सड़क की बाते जीवंत हो उठी हैं।

(ख) सड़क ने अपने बारे में जो कुछ कहा है, उसे संक्षेप में प्रस्तुत करो।

उत्तर : प्रस्तुत पाठ ‘सड़क की बात' में सड़क अपने आपके बारे में कहा है कि   अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हसी,न रोना,सिर्फ अकेली पड़ी हुई।
वह किसी के शाप के कारण चिरनिद्रित सुदीर्घ अजगर की भाँति बहुत दिनों से बेहोशी की नीदं सो रही है। वह आपनी तमन्ना को कभी पूरा न कर पाती। वह बोल नहीं सकती पर अंधो की तरह सब कुछ महसूस कर सकती है। संसार की कोई भी कहानी वह पूरी नही सुन पाती। आज सैकड़ों-हजारों वर्षों से मैं लाखो-करोड़ो लोगों की कितनी हँसी, कितनी गीत, कितनी बातें सुनती आई हैं। पर थोड़ी सी बात सुन पाती हुँ। मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हुँ । सबका उपाय मात्र हुँ। मैं किसी का घर नहीं हुँ, पर सबको घर ले जाती हुँ। प्रतिदिन नियमित रुप से जो मेरे ऊपर चलते हैं, उन्हें मे अच्छी तरह पहुचानती हुँ। अमीर और गरीब, जन्म और मृत्यु सब कुछ मेरे ऊपर एक ही साँस में धूल के स्त्रोत की तरह उड़ता चला जा रहा। मैं और पड़ी रहुँगी।

(ग) सड़क की बातों के जरिए मानव जीवन की जो बातें उजागर हुई हैं, उन पर संक्षिप्त प्रकाश डालो।

उत्तर : सड़क की बात' में लेखक ने सड़क का मानवीकर किया है। सड़क अपनी आप बीती कहानी सुना रही है। दरअसल इस पाठ में लेखक अपनी सूक्ष्म और पैनी दृष्टि से सड़क के अंतरतम का निरीक्षण करके उसकी आकाक्षा, स्थिति एवं उनके मनोभावों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है कि सड़क की बातें जीवंत हो उठे हैं।
इसमें सड़क की बातें के जरिए मानव जीवन की कई महत्वपूर्ण बातें भी उजागार हुई है। लेखक सड़क के माध्यम से कहा जिसके पास सुख की गृहस्थी है, स्वेह की छाया है, वह हर कदम पर सुख की तस्वीर खींचता है, आशा के बीज बोता है। वहाँ क्षण भर में मानो एक एक लता अंकुरित और पुष्पित हो उठेगी। जिसके पास घर
नही, आश्रय नहीं, उसके पदक्षेप में न आशा है,न अर्थ है।


6.सप्रसंग व्याख्या करो:
(क) 'अपनी इस गहरी जड़ निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श से उनके हृदयों को पढ़ लेती हूँ।"

उत्तर :  प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक 'आलोक' के अन्तर्गत मनोरम
आत्मकथात्मक निबंध 'सड़क की बात' से लिया गया है। इसका लेखक विश्वकवि'
कविगुरु रवींद्र नाथ ठाकुर हैं।
 यहाँ ठाकुर जी सड़क की बातों को मानवीय ढंग से प्रस्तुत किये हैं। साथ ही सड़क की इस बेहोशी की नींद को किसी का शाप कहा, जिस के कारण सड़क अपने धूल में लोटकर शाफ की आखिरी घड़ियों का इंतजार करनी पड़ी।
       सड़क अपने आप कह रही है कि अपनी इस जड़ावस्था किसी का शाप है। क्योंकि सड़क अपनी धूल में लोटकर ही सब कुछ महसूस कर सकती हैं, पर बोल नहीं सकती। दिन-रात पैरों की ध्वनि, सिर्फ पैरों की आहट
सुना सकती है। अपनी इस गहरी निद्रा में लाखों चरणों के स्पर्श उनके हृदयों को पढ़ लेती है, वह समझ जाती है कि कौन घर जा रहा है, कौन परदेश जा रहा है, कौन काम से जा रहा है, कौन आराम करने जा रहा है, कौन उव्सब में जा रहा है और कौन शमशान को जा रहा है।
       यहाँ सड़क को मानवीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ख) "मुझे दिन-रात यही संताप सताता रहता है कि मुझ पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता।

उत्तर :  प्रस्तुत गद्यांश विश्वकवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित आत्म कथात्मक निबंध सड़क की बाते से लिया गया है।
    यहाँ लेखक रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी अपनी लेखन कला के द्वारा सड़क को मन की संताप को प्राकश किया है।
          सड़क अपने आप कह रहा है कि वह किसी का भी लक्ष्य नहीं है, वह सबका उपाय मात्र है। वह किसी का घर नही है, परसबको घर ले जाती है। फिर भी कोई उस पर खड़ा रहना पसन्द नहीं करता। जिन का घर बहुत दूर है, वे उसको (सड़क को) ही कोसते है और शाप देते रहते है। वह जो उन्हे परम धैर्य के साथ उनके घर के द्वारतक पहुँचा देती है, इसके लिए कृतज्ञता नहीं पाती। इसलिए सड़क को दिन-रात यही संताप सताता है कि उस पर कोई तबीयत से कदम नहीं रखना चाहता।
         यहाँ सड़क को संताप का प्रकाश हुआ है।


(ग) "मैं अपने ऊपर कुछ भी पड़ा रहने नहीं देती, न हँसी, न रोना, सिर्फ मैं ही अकेली पड़ी हुई हूँ और पड़ी रहूँगी।

उत्तर :

*भाषा एवं व्याकरण ज्ञान
1निम्नलिखित सामासिक शब्दों का विग्रह करके समास का नाम लिखो:
दिन-रात, जड़निद्रा, पग-ध्वनि, चौराहा, प्रतिदिन, आजीवन, अविल, राहखर्च, पथभ्रष्ट, नीलकंठ, महात्मा, रातोंरात

उत्तर : दिन-रात = दिन और रात (द्वंद समास)
जड़निद्रा = जड़ है निद्रा जिसका
 पग-ध्वनि= पग के ध्वनि (संबंध तत्पुरुष)
 चौराहा = चार राहो का समाहार (द्विगु समास)
प्रतिदिन = प्रत्येक दिन (अव्ययीभाव समास)
आजीवन = जीवन पर्यन्त/जीवन भर (अव्ययीभाव)
 अविल = न विल (नज समास)
राहखर्च = राह के लिए खर्च (संप्रदान तत्पुरुष समास)
पथभ्रष्ट = पथ स भ्रष्ट (अपादान तत्पुरुष समास)
, महात्मा = महान है जो आत्मा (कर्म धारय समास)
रातोंरात = रात ही रात (अव्ययीभाव समास)

2.निम्नांकित उपसर्गों का प्रयोग करके दो-दो शब्द बनाओ:
परा, अप, अधि, उप, अभि, अति, सु, अव

उत्तर : परा =>  परा+जय = पराजय    ,   परा + भूत = पराभूत
 अप =>  अप+कार=  अपकार  , अप+ कर्म-= अपकर्म
अधि => अधि+कार = अधिकार, अधि+ग्रहण = अधिग्रहण
 उप =>   उप  + कृत  = उपकृत  , उप+कार = उपकार
अभि => अभि  + मान = अभिमान , अभि + राम = अभिराम
अति = अति + अंत = अत्यंत , अति + आचार = अत्याचार
 सु =  सु + गम = सुगम , सु + लाभ = सुलभ
अव = अव + मूल्यन = अवमूल्यन , अव  +  सर = अवसर

3. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्गों को अलग करो :
अनुभव, बेहोश, परदेश, खुशबू, दुर्दशा, दुस्साहस, निर्दय

उत्तर : अनुभव = अनु + भव
बेहोश = बे + होश
परदेश = पर + देश
 खुशबू = खुश + बू
दुर्दशा =  दूर + दशा
दुस्साहस =  दूस + साहस
निर्दय= निर + दय

4. निम्नांकित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखो:
सड़क, जंगल, आनंद, घर, संसार, माता, आँख, नदी

उत्तर : सड़क = रास्ता , पथ
जंगल = वन , कानन
आनंद = ख़ुशी , मोद
 घर =  मकान , मंदिर
संसार = दुनिया , पृथ्वी
  माता =  माँ , मातृ
आँख = नयन , नेत्र
नदी = नट , सरिता


5. विपरीतार्थक शब्द लिखो:
मृत्यु, अमीर, शाप, छाया, जड़, आशा, हँसी, आरंभ, कृतज्ञ, पास, निर्मल, जवाब, सूक्ष्म, धनी, आकर्षण

उत्तर :

मृत्यु = जन्म
अमीर = गरीब
 शाप = आशिर्बाद
 छाया = धुप
जड़ = चेतन
आशा =  निराशा
हँसी = रोना
आरंभ = अंत
 कृतज्ञ = कृतघ्न
पास = दूर
निर्मल = मयला
जवाब = सवाल
 सूक्ष्म = विशाल
धनी = गरीब
आकर्षण = विकर्षण

6. संधि-विच्छेद करो :
देहावसान, उज्ज्वल, रवींद्र, सूर्योदय, सदैव, अत्यधिक, जगन्नाथ, उच्चारण, संसार, मनोरथ, आशीर्वाद, दुस्साहस, नीरस

उत्तर :

देहावसान = देहा  + अवसान
उज्ज्वल = उत  + ज्वल
रवींद्र = रवि + इंद्रा
सूर्योदय = सूर्य +  उदय
 सदैव = सदा  + एव
अत्यधिक = अति + अधिक
जगन्नाथ = जगत  + नाथ
उच्चारण = उत  + चरण
 संसार = सम  + सार
 मनोरथ = मनः+रथ
आशीर्वाद = अशीर  + वाद
 दुस्साहस = दू: + साहस
 नीरस = नि : रस


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